Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 55
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
तब चित् और अचित् से पथक् तृतीय स्वरूपवाला ही मैं क्यो न होऊँ, तो इस पर कहते हैं।
हे शठ, जैसे इस जगत् में छाया और धूप इन दो के बीच में से किसी एक का ही अनुरंजन (सम्बन्ध)
सब पदार्थो में रहता है, तीसरे किसी का अनुरंजन नहीं रहता है, वैसे ही चित् ओर जड़ इन दो अंश-
कलनाओं को छोड़कर भिन्न तीसरी कोई कलना ही नहीं रहती