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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

जीवतस्तत्तवात्यन्तमभावं क इवेच्छति । किंतु नास्त्यसि सत्येन वदामि तव सुन्दर ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

जब तुम्हारा स्वरूप ही दुर्लभ है, तब तुम्हारा अभिमान के द्वारा दूसरों की रक्षा करना तो दूरतः ही निरस्त है, इस आशय से कहते है। संविद्रूपी चैतन्य अनादि ओर अनन्त है, संविद्‌ से दूसरा कुछ भी नहीं है, इसलिए हे महामूर्ख, इस शरीर में चित्त नामवाले तुम कौन हो ?