Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
स्वात्मन्येवावतिष्ठेऽहं तुर्यरूपपदे स्थितः ।
अतो नास्त्येव नास्त्येव संसारे चित्तमस्थिति ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए बोधसत्ता के अधीन ही तुम्हारा नाम और रूप से स्वरूप-लाभ है, ऐसा कहते हैं।
हे चित्त, चूँकि इस ब्रह्माण्ड में केवल बोधमात्रस्वरूप आत्मसत्ता ही रफुरित होती है, इसलिए उसी
आत्मसत्ता से तुमने नाम ओर अर्थ को प्राप्त कर अपना अस्तित्व बना रक्खा हे