Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
विचारे विहिते सम्यक्समरूपं समं स्थितम् ।
अविचारात्प्रजातं त्वमनालोकात्तमो यथा ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
भोगानुभव की सामर्थ्य से वर्जित, जड एवं मिथ्याभूत तुम्हारी भोगाभिलाषा निरर्थक ही है, ऐसा
कहते है।
हे चित्त, तुम भोगों के कौन होते हो अथवा भोग तुम्हारे कोन होते हैं ? जडस्वरूप तुम्हारा जब
स्वरूप (अस्तित्व) ही नहीं है, तब बन्धु, मित्र आदि तुम्हारे कैसे हो सकते हैं