Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
येनैव पश्यसि श्रेयस्तमेवाङ्गीकुरु क्षणम् ।
स्वात्मभावस्तव सुखं मन्ये मानवतां वर ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे चित्त, “मैं ही जीता हूँ” इस प्रकार की यह तुम्हारी
अहंकाररूपी दुर्बुद्धि दुःख के लिए मिथ्या ही उत्पन्न हुई है। वह सत्य नहीं है, क्योंकि वह परमात्मस्वरूप
से वर्जित है। निष्कर्ष यह है कि अहंकार के अधीन जीवन सत्यभूत नहीं हो सकता, क्योकि उसके
(अहंकार के) न रहते हुए भी सुषुप्ति में जीवन देखने में आता है। अहंबुद्धि मिथ्यास्वरूप ही है, क्योंकि
सत्यभूत परमात्मा का तनिक भी उसमें सम्बन्ध नहीं है । इस विषय में श्रुति भी है : न प्राणेन नापानेन
मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ (मरणधर्मा न प्राणों से ओर न अपान
से जीता है, प्रत्युत दूसरी वस्तु से ब्रह्म से ही जीता हे, जिसमें ये प्राण ओर अपान समाश्रित हैं)