Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
प्रशान्तमोहमिहिकं राजते हृदयाम्बरम् ।
निर्मलालोकवलितं नीरजस्कतरान्तरम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
यों चित्त के दोषो की समालोचना करके मुनि वीतहव्य ने उसके निर्गमन के द्वारो की समालोचना
की, यह कहते है।
अतिनिन्दित इन्द्रिय नामवाले ये चक्षु आदि मन के पांच द्वार है अब मैं उनके विषय में भली भाँति
विचार करता हूँ