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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 67

छासठवाँ सर्ग समाप्त सड़सठवाँ सर्ग भोक्ता जीव के स्वरूपका प्रतिपादन ।

71 verse-groups

  1. Verse 1समष्टि की प्रधानता से उक्त जीव को व्यष्टि की प्रधानता द्वारा स्पष्टरूप से जानने की इच्छा…
  2. Verse 2जिसकी अनन्त ओर अचिन्त्य शक्तियाँ हैं, ऐसी मायाशक्ति से युक्त ब्रह्म, जो कि परमार्थरूप से…
  3. Verse 3सबका आत्मा ब्रह्म अनादिकाल से जिस चेतनरूपिणी को यानी चित्त के संस्कार से उपहित (उपाधियुक्…
  4. Verse 4अपने में स्वाभाविक द्वितीयता (भेद) ही आगे होनेवाले संसार की प्रवृत्तिका मुख्य कारण है, पह…
  5. Verse 5इसीसे मेरे प्रश्न के अवशिष्ट अंशका भी उत्तर हो चुका, यों सोच रहे श्रीरामचन्द्रजी उक्त जीव…
  6. Verse 6श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जैसे आकाश में स्पन्दस्वभाववाला और अस्पन्दस्वभ…
  7. Verse 7उक्त दो प्रकार के चिन्मात्रों में से प्रथम यानी स्पन्दस्वभाव (रजोगुणप्रधान माया से उपहित)…
  8. Verse 8स्पन्द से चित्‌ की प्रपंचरूपता और अस्यन्द से निष्प्रपंचरूपता ऐसा निष्कर्ष होने पर स्पन्द…
  9. Verse 9जीव, कारण, कर्म ओर दैव की ज्ञानरूप ब्रह्म की सत्ता के अवलम्बन से ही सत्ता और अपना कार्य क…
  10. Verse 10जो यह पूछना था कि यदि जीव परमात्मा ही है, तो वह परमात्मा में कैसे उत्पन्न हआ ? उसका उत्तर…
  11. Verse 11विविध हजारों योनियों को देनेवाले कर्म, कारण ओर दैव को प्राप्त हुआ कोई चित्स्पन्द, जिसकी श…
  12. Verse 12जिस प्रकार की उपाधि से मिल जाय उस रूप से स्फुरण चित्‌ का स्वभाव है जैसे कि प्रकाश नीले कप…
  13. Verse 13सुवर्णं में कटकत्व, केयूरत्व आदि के समान काठ ओर ढेले के समान जड देह में जन्म, वृद्धि आदि…
  14. Verse 14इस प्रकार भेद के मिथ्या होने पर भी जो जन्म आदि भेदज्ञान होता है, वह मन का भ्रम ही है, ऐसा…
  15. Verse 15जितने भेदज्ञान हैं, उनका मूल अहम्‌, मम” यह भेदकल्पना ही है, उसके भी परमात्मा के स्वरूपका…
  16. Verse 16उक्त विषय में आगे कहे जानेवाले लवणोपाख्यान का दृष्टान्तरूप से निर्देश करते हैं । जैसे मथु…
  17. Verse 17हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे जल तरंगरूप से स्फुरित होता है, वैसे ही मन की भ्रान्ति का प्रचुर…
  18. Verse 18जैसे सौम्य (निश्चल यानी तरंगरहित) समुद्र से पहले थोड़ा थोड़ा जल का संचलन होता है यानी तरं…
  19. Verse 19चिति-रूपी जल ब्रह्मरूपी समुद्र में स्फुरण से (संचलन या स्पन्दन से) जीवरूपी आवर्तता को धार…
  20. Verse 20हे सौम्य श्रीरामचन्द्रजी, अपने बोधमात्र से मायाबन्धनका विनाश करनेवाले या सिंह के सदृश अचि…
  21. Verse 21जिन उपाधियों से जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि शब्दों का भेद है, उनको कहते हैं । वह च…
  22. Verse 22उनमें संकल्पप्रधान मन पहले शब्द आदि सूक्ष्म थूतों की (तन्मात्राओं की) कल्पना कर जगत्‌ की…
  23. Verse 23मन से कल्पित वस्तु मनयूबों से बनी हूर वस्तु के समान मिथ्या ही है, ऐसा कहते है । जैसे आकाश…
  24. Verse 24जगत्‌ का साक्षी तो नित्य शुद्ध ही है, ऐसा कहते हैं । विशुद्ध, क्षुधा, पिपासा आदि के अभाव…
  25. Verse 25उस शुद्ध आत्मा का इन्द्रियों द्वारा बाहर निकलना जाग्रत कहा गया है, भीतर अहंभाव से युक्त उ…
  26. Verse 26इस प्रकार शोधित प्रत्यगात्मा की अत्यन्त शुद्ध सन्मात्र ब्रह्मात्मा में परिणति से निर्विका…
  27. Verse 27अशोधित तत्पदा्थमि स्थिति की शंका का निवारण करने के लिए उसका शोधन (तज्जलानिति शान्त उपासीत…
  28. Verse 28यदि उसमें जगत्‌ का कोई संसर्ग नहीं है, तो श्रुति ने उसे जगत्‌ का हेतु कैसे कहा ? जैसे वृक…
  29. Verses 29–30जैसे लोहे का बना हुआ दर्पण सन्निधिमात्र से प्रतिबिम्बका हेतु होता है, वैसे ही चेतनमय परमा…
  30. Verse 31यदि किसीको शंका हो कि प्रलयकाल मे सबका लय होने पर विति सदा वैसी ही स्वस्थ क्यो नहीं रहती,…
  31. Verses 32–33यदि कोई शंका करे कि जैसे बीज में सूक्ष्मरूप से स्थित वृक्षका ओर उसके बीज का बोध हो चाहे न…
  32. Verse 34बोध की ऐसी सामर्थ्य कैसे है 2 यदि कोई ऐसी शंका करे, तो उसपर बोध, विचारजन्य होने के कारण,…
  33. Verse 35जैसे स्फटिक के अन्दर प्रतिबिम्बित वन आदि यह प्रतिबिम्ब है, ऐसा जाने बिना सत्य प्रतीत होता…
  34. Verse 36जैसे एक अखण्ड स्फटिकशिला फल, पत्ते, लता, झाड़ी और उनके आधार तथा उनके अन्तर्गत बीजरूप से स…
  35. Verse 37इस प्रकार वर्णित जीव, मन, बुद्धि और अहंकारस्वरूप जगत्‌ की मायामात्रता को सुनकर आश्चर्यमग्…
  36. Verses 38–41जिस प्रकार ब्रह्म में प्रतिभासस्वरूप और ओस के बिन्दु के समान तन्मात्रारूप गुण से युक्त यह…
  37. Verse 42पूर्वोक्त प्रश्न का उत्तर देने के लिए सर्वप्रथम अत्यन्त असम्भावित अनिर्वचनीय स्थूलतापर्यन…
  38. Verse 43जैसे ब्रह्म शीघ्र जीव, जिसका कल्पना ही स्वरूप है, हो जाता है, वैसे ही जीव मननवासना से उत्…
  39. Verses 44–45वह मन पंचतन्मात्राओं का मनन करने से अपने को पंचतन्मात्रारूप में आविर्भूत देखता है, यानी प…
  40. Verse 46उसमें पहले शब्द और अर्थ के विभाग की स्फूर्ति से मोहाक्रान्त अहन्ताध्यास ओर तदनन्तर संसारत…
  41. Verse 47जीव की क्रमश: इन्द्रियों की कल्पना को कहते हैं। तदनन्तर शरीरपिण्ड में अस्फुट अहंभाव के ज्…
  42. Verse 48तदनन्त शरीरपिण्ड में अस्फुट अहंभाव के ज्ञान से चक्षुरिन्द्रिय ओर उसके विषय रूप की ओर उन्म…
  43. Verse 49तदनन्तर शरीरपिण्ड में अस्फुट अहंभाव के ज्ञान से घ्राणेन्द्रिय के दर्शन के संकल्प से घ्राण…
  44. Verse 50इस प्रकारका वह जीवात्मा धीरे-धीरे काकतालीयन्याय के अनुसार पूर्ववासना से कल्पित स्वयं विशि…
  45. Verses 51–53श्रोत्र आदि इन्द्रियों के द्वारा उसका शब्द आदिभोग होने पर तत्‌-तत्‌ इन्द्रियों में तादात्…
  46. Verse 54इस प्रकार उक्त ओर अनुक्त भावमय इन्द्रियों से भावमय देह में बाह्य पदार्थोकी सत्ता को प्रकट…
  47. Verse 55हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार आदि जीव यानी समष्टिरूप और अद्यतन (व्यष्टि) जीव का प्रतिभासस…
  48. Verse 56ब्रह्म के ही अज्ञान से विविध आतिवाहिक देहो की प्राप्ति होती है और ज्ञान से आतिवाहिक देहों…
  49. Verse 57जब ब्रह्म के परिज्ञान से प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि ब्रह्मस्वरूप ही हैं, तब आतिवाहिक देह…
  50. Verse 58भेदज्ञान से आतिवाहिक ब्रह्म से अन्य प्रतीत होता है और ब्रह्मत्वज्ञान से तो वह आतिवाहिक ब्…
  51. Verse 59यदि ऐसा है, तो चिदेकरस ब्रह्म में अज्ञान का सम्पर्क न होने से अज्ञान न होने के कारण जीवभे…
  52. Verse 60क्या यह प्रश्न तात्विक वस्तु को जानकर किया गया है अथवा बिना जाने । यदि जानकर किया गया है,…
  53. Verse 61जैसे अत्यन्त शोभायमान भी अकाल-पुष्पमाला तत्काल में उपभोग सुख देने के कारण सार्थक भी क्यों…
  54. Verse 62इस लोक में हेमन्त आदि काल धान आदि के अंकुरों की उत्पत्ति की प्रतिकूलता ओर जव आदि के अंकुर…
  55. Verse 63इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की मध्यपाती शंका का मखौल से ही समाधान कर “अनाख्येययम्‌” यहाँ तक…
  56. Verse 64वह प्रणव के उच्चारण से और उसके अर्थ के परिज्ञान से सम्पूर्ण प्रपंच की सृष्टि करता है, ऐसा…
  57. Verse 65इस प्रकार व्यष्टि के संकल्प के अनुसार समष्टि का संकल्पस्वरूप यह जगत्‌ मिथ्या ही है, ऐसा फ…
  58. Verse 66इस प्रकार सृष्टि का प्रतिपादन प्रच के मिथ्यात्व का बोधन करने के लिए ही है, वास्तविक सृष्ट…
  59. Verse 67जीवत्व भी जगत्कोटि में ही है, ऐसा दशनि के लिए जगत्‌ की सत्ता जीवसत्ता के तुल्य है, ऐसा कह…
  60. Verse 68परमार्थद्ष्टि से तो कहते हैं। ब्रह्मा से लेकर कीट, पतंगपर्यन्त प्रसिद्ध संवित्ति (वृत्त्य…
  61. Verses 69–70“अब्रह्मकीटसवित्तेः“ इस अंश का उपपादन करते हैं। जैसे ब्रह्मा उत्पन्न होता है, वैसे ही कीड…
  62. Verse 71उन दो में युकृतरूप सार के उत्कर्षे की चरम सीमा का फल ब्रह्मता (ब्रह्मा का पद) है, और दुष्…
  63. Verse 72यदि कोई शंका करे कि जब तक प्रमाता प्रमाण से प्रमेयरूप द्वैत का अनुभव करता है, तब तक द्वैत…
  64. Verse 73यदि शंका हो कि मान से मेय यदि द्वैत नहीं है, तो करोड़ों कुदालों से दुर्भेद्य भुवन आदिभाव…
  65. Verse 74यदि बन्धन स्वकल्पित ही है, तो प्रत्येक पुरुष में उसकी अभिलाषा के अनुसार ही कल्पना होगी, अ…
  66. Verse 75वट के बीज से वटका अंकुर होता है, कुटज के बीज से वट का अंकुर नहीं होता ओर बुद्बुद कुछ ही न…
  67. Verse 76हम लोगों की अस्वतन्त्रता के प्रभाव से और नियति द्वारा निर्धारित शक्ति, काल आदि की व्यवस्थ…
  68. Verse 77तीन सर्गो में पद्यों द्वारा जो अर्थ विस्तारपूर्वक कहा गया है, उसीको गद्यों द्वारा संक्षेप…
  69. Verses 78–79जैसे जल भिन्न है और तरंग भिन्न हे, ऐसी मूर्खो की कुकल्पना से अवास्तविक भेद प्रतीत होता है…
  70. Verse 80इस ब्रह्म से निर्विकल्प जगत्‌ का स्फुरण हुआ, वही सविकल्पता को प्राप्त होकर मन बन गया, उसन…
  71. Verses 81–82तदनन्तर मन और अहंकार से अनुभव के अनुसार स्मृति उत्पादित हुई, मन, अहंकार ओर स्मृति-इन तीनो…