Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
समस्तशक्तिखचितं ब्रह्म सर्वेश्वरं सदा ।
ययैव शक्त्या स्फुरति प्राप्तां तामेव पश्यति ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसकी अनन्त ओर अचिन्त्य शक्तियाँ हैं, ऐसी मायाशक्ति से युक्त ब्रह्म, जो कि
परमार्थरूप से अविकृत और अद्वितीय है, मायावश द्वितीयता को (भेद को) प्राप्त हुए-से
अपने मे विविध ओपाधिक विकारों का आरोप कर असंख्य जीवों के वेश से और सर्वज्ञ ईश्वररूप
से क्रीडा करने में समर्थ है, इसलिए पूर्वोक्त कोड भी दोष प्राप्त नहीं होता इस आशयसे
श्रीवसिष्ठजी समाधान के लिए भूमिका बाँधते हैं ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, सदा सब शक्तियों से परिपूर्ण ब्रह्म सब कुछ करने के
लिए समर्थ है । वह जहाँपर जिस शक्ति से प्रस्फुरित होता है, वहाँ पर वह अपने को उसी
शक्ति से सम्पन्न देखता है