Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स्पन्दास्पन्दस्वभावं हि चिन्मात्रमिह विद्यते ।
खे वात इव तत्स्पन्दात्सोल्लासं शान्तमन्यथा ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जैसे आकाश में
स्पन्दस्वभाववाला और अस्पन्दस्वभाववाला वायु ही है, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं है, वैसे
ही इस संसार में स्पन्दस्वभाववाला (रजोगुणप्रधान माया से उपहित) तथा अस्पन्दस्वभाव-
वाला (शुद्ध) चिन्मात्र ही है, उससे अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है, वह चेतन स्पन्द से
उल्लासयुक्त (सृष्टि में तत्पर) होता है और स्पन्द न होने से शान्त ही रहता है