Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 66
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 66
संस्कृत श्लोक
नेह प्रजायते किंचिन्नेह किंचिद्विनश्यति ।
जगद्गन्धर्वनगररूपेण ब्रह्म जृम्भते ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार सृष्टि का प्रतिपादन प्रच के मिथ्यात्व का बोधन करने के लिए ही है, वास्तविक
सृष्टि के प्रतिपादन के लिए नहीं है, इस अभिप्राय से “न निरोधो न चोत्पत्तिः“ इत्यादि श्रुति के
आशय को अभिव्यक्त करते है ।
यहाँ न तो कोई वस्तु उत्पन्न होती है ओर न कोई विनष्ट होती है, ब्रह्म ही जगद्रूषी
गन्धर्वनगर के आकार से स्फुरण को प्राप्त होता हे