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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verses 51–53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verses 51–53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 51-53

संस्कृत श्लोक

स तस्य संनिवेशस्य त्वसतोऽपि सतः सतः । शब्दभावैकदेशत्वं श्रवणार्थेन विन्दति ॥ ५१ ॥ स्पर्शभावैकदेशत्वं त्वक्शब्दार्थेन विन्दति । रसभावैकदेशत्वं रसनात्वेन विन्दति ॥ ५२ ॥ रूपभावैकदेशत्वं नेत्रार्थाकृति पश्यति । गन्धभावैकदेशत्वं नासिकात्वेन पश्यति ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रोत्र आदि इन्द्रियों के द्वारा उसका शब्द आदिभोग होने पर तत्‌-तत्‌ इन्द्रियों में तादात्स्याध्यास के विषय मे कहते हैं। असत्‌ होता हुआ भी सत्‌ और सत्त्वसम्पन्न उस इन्द्रियादिसंघात के श्रोत्ररूप देहेकदेशता को श्रवण रूप क्रिया के लिए वह प्राप्त होता हे । रपर्शभावरूप त्वगिन्द्रिय-रूप देहेकदेशता को स्पर्शक्रिया के लिए प्राप्त होता है । रूपभाव यानी चक्षुरिन्द्रिय-रूप देहैकदेशता को दर्शनरूप क्रिया के लिए देखता है, प्राणेन्द्रियरूप देहैकदेशता को गन्धग्रहणक्रिया के लिए प्राप्त होता है