Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 73
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 73 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 73
संस्कृत श्लोक
भावदार्ढ्यात्मकं मिथ्या ब्रह्मानन्दो विभाव्यते ।
आत्मैव कोशकारेण लालादार्ढ्यात्मकं यथा ॥ ७३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि मान से मेय यदि द्वैत नहीं है, तो करोड़ों कुदालों से दुर्भेद्य भुवन आदिभाव
दृढतारूप द्वैत कैसे प्रतीत होता है, तो इस पर कहते हैं।
ब्रह्मानन्दरूप आत्मा ही बन्धन में डालनेवाला भुवन आदि भाव की दृढता रूप द्वैत है,
एेसा भ्रान्ति से प्रतीत होता है, जैसे रेशम के कीड़े द्वारा अपनी लार की दुढतारूप बन्धन का
अनुभव किया जाता हे, वैसे ही आत्मा के द्वारा भी स्वबन्धक भुवनभावदृढता रूप द्वैत का
अनुभव किया जाता हे