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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

तस्मिन्सर्वमुदेतीदं तस्मिन्नेव प्रलीयते । न चेदं न च तत्रेदं दृष्टौ मुक्तावली यथा ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

अशोधित तत्पदा्थमि स्थिति की शंका का निवारण करने के लिए उसका शोधन (तज्जलानिति शान्त उपासीत“ इस श्रुति से परिदर्शित रीति के अनुसार दिखलाते हैं । उसमे यह सब उदित होता है, उसीमें रहता है और उसीमे लीन हो जाता हे, न तो यह ब्रह्म जगत्‌-रूप है ओर न उसमें जगत्‌ का सम्बन्ध है, जैसे दृष्टि के विस्तार से आकाश में मुक्तावली का भ्रम होता है, वसे ही मायावश इस जगत्‌ का भ्रम होता है