Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
मानमेयात्मिका शुद्धा सत्यैवासत्यवत्स्थिता ।
भिन्नेव च न भिन्ना स्याद्ब्रह्मणो ब्रंह्मणात्मिका ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त प्रश्न का उत्तर देने के लिए सर्वप्रथम अत्यन्त असम्भावित अनिर्वचनीय
स्थूलतापर्यन्त सम्पूर्ण वासना ओं से वृद्धि को प्राप्त हुए जीवभाव के आविर्भाव को दुष्टान्तपूर्वक
दिखलातेहै।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, जीव अत्यन्त असंभावित, अत्यन्त अननुभूत ओर
अनन्य होता हुआ भी पहले अनुभूत-सा प्रतीत होता है । जैसे वास्तव में विकसित अंग से
शून्य वेताल भी बालक के हृदय में विकसित अंगवाला होकर र्पष्टरूप से उदित होता है, वैसे
ही स्वस्वभावरूप जीवता परब्रह्म में उदित होती है ॥४०, ४ १॥
जो वस्तु अनुभूत नहीं है, उसका मनन नहीं हो सकता तथा अनुभव प्रमाण और प्रमेय के
अधीन है, इसलिए मनोभाव के निमित्त प्रमाण और प्रमेयकी वासनाओं की उत्पत्ति कहते हैं।
वह जीवता, जो मानमेयरूप, शुद्ध, सत्य होती हुई असत्य के समान स्थित है, ब्रह्म से
भिन्न न होती हुई भी भिन्न-सी प्रतीत होती है, ब्रह्म का बुंहणात्मक जो स्वरूप है, तद्रूप
है