Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
अरोधकत्वात्खं हेतुर्यथा वृक्षसमुन्नतेः ।
अकर्तापि तथा कर्ता चेतनाब्धिर्जगत्स्थितेः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि उसमें जगत् का कोई संसर्ग नहीं है, तो श्रुति ने उसे जगत् का हेतु कैसे कहा ?
जैसे वृक्ष की उन्नति में (वृद्धि मेँ) अवरोधक (रुकावट डालनेवाला) न होने से आकाश
वृक्ष की उन्नति का कारण है, वैसे ही चेतन्यसमुद्र परमात्मा जगत्-सृष्टिका कर्ता न होने पर
भी उसका अवरोधक न होने से कर्ता कहा जाता हे । भाव यह कि माया द्वारा रचित सृष्टिका
केवल निवारण न करनेमात्र से उसमें कर्तृत्व का उपचार होता हे