Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 64
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
ओंमुच्चारणसंवित्तिवेदनाच्च प्रपश्यति ।
यत्करोति मनोराज्यं भवत्याशु स तन्मयः ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
वह प्रणव के उच्चारण से और उसके अर्थ के परिज्ञान से सम्पूर्ण प्रपंच की सृष्टि करता है,
ऐसा कहते हैं।
ॐकार के उच्चारण और तदर्थ के परिज्ञान से जो संकल्प करता है, तुरन्त तन्मय हो
जाता है अर्थात् संकल्पानुसार पदार्थो को प्रकट देखता है