Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
कृतद्वित्वचिदाभासवशाद्देहमुपस्थितम् ।
संकल्पाद्विविधार्थत्वं चित्स्पन्दो याति सृष्टिषु ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जो यह पूछना था कि यदि जीव परमात्मा ही है, तो वह परमात्मा में कैसे उत्पन्न हआ ?
उसका उत्तर कहते है ।
जिसने भेद की कल्पना कर रक्खी है, ऐसे चिदाभास के कारण (बुद्धि में आत्मा के प्रतिबिम्ब
के कारण) चित्स्पन्द सूष्टिकाल में तत्-तत् विविध कर्मो के अनुसार पहले मरने के समय
बुद्धि में प्राप्त हुए देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के शरीरो को और पूर्व के संकल्पो के
अनुसार विविध भोग्य पदार्थरूपता को प्राप्त होता हे । चित् का आभास यानी स्वीय अविद्या में
प्रतिबिम्ब स्फुरित होकर जो द्वैत होता है उसी द्वैत से अर्थात् उक्त द्वित्वभाव से शास्त्र मेँ उक्त
क्रम से शरीर की उत्पत्ति होती है, इसलिए चित्स्पन्द ही अपने संकल्प के अनुसार सृष्टि के
आदि में विविध भोग्य आकारो को प्राप्त होता है, यह भाव हे