Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verses 44–45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 44,45
संस्कृत श्लोक
चित्तं तन्मात्रमननं पश्यत्याशु स्वरूपवत् ।
एष सद्योऽनिललवप्रख्यः स्फुरति खान्तरे ॥ ४४ ॥
अस्तनिमेषोऽनुभवत्यवश्यायकणोपमम् ।
संवेदनात्मकं कालकलितं कान्तमात्मनि ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
वह मन पंचतन्मात्राओं का
मनन करने से अपने को पंचतन्मात्रारूप में आविर्भूत देखता है, यानी पंचतन्मात्राओं का मनन
करने से पंचतन्मात्रा बन जाता है, यह भाव है । अविच्छिन्न दृग्रूपवाला और अतिसूक्ष्म वह
पंचतन्मात्रात्मा शीघ्र चिदाकाश में स्फुरित होता हे ओर उसके स्वतःप्रकाशमान होने पर अपनी
सूर्य के समान प्रकाशमान अपरिच्छिन्न चित् दृष्टि द्वारा ओस के बिन्दु के सदुश ब्रह्माण्डरूप
और मनुष्य आदि के देहरूप को अपने में देखता हे