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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verses 38–41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verses 38–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 38,39

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मणि प्रतिभासात्मा तन्मात्रगुणगोलकः । अवश्यायकणाभासो यथा स्फुरति तच्छ्रुतम् ॥ ३८ ॥ यथाऽसौ याति वैपुल्यं यथा भवति चात्मभूः । यथा स्वभावसिद्धार्थात्तथा कथय मे प्रभो ॥ ३९ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । अत्यन्तासंभवद्रूपमनन्यत्स्वस्वभावतः । अत्यन्ताननुभूतं सत्स्वानुभूतमिवाग्रतः ॥ ४० ॥ उल्लासफुल्लो फुल्लाङ्ग इति बालहृदि स्फुटम् । यथोदेति तथोदेति परे ब्रह्मणि जीवता ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस प्रकार ब्रह्म में प्रतिभासस्वरूप और ओस के बिन्दु के समान तन्मात्रारूप गुण से युक्त यह ब्रह्माण्ड स्फुरित होता है, वह मैंने आपसे सुना । पर जैसे यह यथार्थस्वभावसिद्ध आत्मवस्तु से विपुलता को यानी समष्टि, व्यष्टि, स्थूलदेहता को प्राप्त होता है और जैसे व्यष्टि, समष्टि का उपभोग करनेवाला वैश्वानररूपवाला होता है, वैसा आप मुझसे कहिए