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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verses 29–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 29, 30

संस्कृत श्लोक

संनिधानाद्यथा लौहः प्रतिबिम्बस्य हेतुताम् । यात्यादर्शस्तथैवायं चिन्मयोऽप्यर्थवेदने ॥ २९ ॥ बीजमङ्कुरपत्रादियुक्त्या यद्वत्फलं भवेत् । चिन्मात्रं चित्तजीवादियुक्त्या तद्वन्मनो भवेत् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे लोहे का बना हुआ दर्पण सन्निधिमात्र से प्रतिबिम्बका हेतु होता है, वैसे ही चेतनमय परमात्मा सन्निधिमात्र से पदार्थप्रलीति में कारण होता है । जैसे बीज, अंकुर, पत्ते आदि के क्रम से फल होता है, वैसे ही चिन्मात्र चित्त, जीव आदि के क्रम से मन होता है