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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

हेम्नीव कटकादित्वं काष्ठलोष्टसमस्थितौ । देहे तिष्ठति नानात्वं जडे भावविकारजम् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

सुवर्णं में कटकत्व, केयूरत्व आदि के समान काठ ओर ढेले के समान जड देह में जन्म, वृद्धि आदि छः भावविकारों से उत्पन्न भेद रहता है | देह आदि उपाधियाँ पंचमहाभूतों की विकार हैं, पंचभूतों में भी पीछे-पीछे के पंचमहाभूत पूर्व पूर्व महाभूतं के विकार हैं, यों उनके अखण्डाकाशमात्र होने पर सत्य भेद का अवकाश नहीं है, इस आशय से सुवर्ण-कटक दृष्टान्त दिया गया है