Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
एवंप्रायः स जीवात्मा काकतालीयवच्छनैः ।
विशिष्टसंनिवेशत्वं भावितं पश्यति स्वतः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकारका वह जीवात्मा धीरे-धीरे काकतालीयन्याय के अनुसार पूर्ववासना
से कल्पित स्वयं विशिष्ट देहादिसन्निवेश का अनुभव करता हे