Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verses 69–70
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verses 69–70 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 69,70
संस्कृत श्लोक
यथा संपद्यते ब्रह्मा कीटः संपद्यते तथा ।
कीटस्तु रूढभूतौघवलनात्तुच्छकर्मकः ॥ ६९ ॥
यदेव जीवनं जीवे चेत्योन्मुखचिदात्मकम् ।
तदेव पौरुषं तस्मिन्सारं कर्म तदेव च ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
“अब्रह्मकीटसवित्तेः“ इस अंश का उपपादन करते हैं।
जैसे ब्रह्मा उत्पन्न होता है, वैसे ही कीड़ा भी उत्पन्न होता है।
शंका - कीड़े में क्षुद्रकर्मता कैसे ?
समाधान - भौतिक मालिन्य के आधिक्य से कीड़ा क्षुद्र कर्म करता है । जीव में जो ही
विषयोन्मुख चैतन्यरूप जीवन है, वही उसमें पौरुष है, वही फलरूप में पर्यवसन्न होनेवाला
कर्म है, वह कर्म ही पौरुष है । यानी उपाधि का अनुसरण करनेवाली जीवता है ओर जीवता
का अनुसरण करनेवाला पौरुष है, पौरुष ही फलपर्यवसायी कर्म है और उक्त कर्म ही
पौरुष हे