Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
मथुराधिपते राज्ञो यथा श्वपचसंभ्रमः ।
आसीदेवं हि चित्तस्य स्फुरतीयं जगत्स्थितिः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त विषय में आगे कहे जानेवाले लवणोपाख्यान का दृष्टान्तरूप से निर्देश करते हैं ।
जैसे मथुराधिपतिराजा लवण का अपने में “मे चाण्डाल हूँ” ऐसा भ्रम हुआ था, वैसे ही यह
जगत्-स्थिति, जो कि चित्त की भ्रान्तिरूप है, स्फुरित होती है