Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
स्पन्दात्स्फुरति चित्सर्गो निःस्पन्दाद्ब्रह्म शाश्वतम् ।
जीवकारणकर्माद्या चित्स्पन्दस्याभिधा स्मृता ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
स्पन्द से चित् की प्रपंचरूपता और अस्यन्द से निष्प्रपंचरूपता ऐसा निष्कर्ष होने पर
स्पन्द का ही जीव, कारण, कर्म, देव आदि नाम से निर्देश होता है, ऐसा तात्पर्यार्थ कहते हैं।
चिति स्पन्द से सृष्टिरूप में स्फुरित होती है ओर स्पन्द के अभाव से अविनाशी
ब्रह्मरूप है जीव, कारण, कर्म आदि चित् के स्पन्द के ही नाम हैं । भाव यह कि वह चैतन्य
ही प्राणस्पन्द की विवक्षा (प्रयोजन) से जीव कहलाता है, अपने भीतर स्थित कार्यो के
आविर्भावरूप स्पन्द की विवक्षा से कारण कहा जाता है, शरीर आदि के स्पन्द की विवक्षा
से कर्म कहलाता है । कर्म ही, जो कि सूक्ष्म अवस्थावाला, चिरकाल से स्थित ओर फल
के आरम्भ में तत्पर होता है, दैव कहा जाता हे