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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 67, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

स्वभावात्कारणाद्वित्वं चित्समेत्याधिगच्छति । स्वर्गापवर्गनरकबन्धकारणतां शनैः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस प्रकार की उपाधि से मिल जाय उस रूप से स्फुरण चित्‌ का स्वभाव है जैसे कि प्रकाश नीले कपड़े में नीला, लाल में लाल और पीले में पीला होता है उक्त स्वभाव के कारण ही चिति देह के जन्म के कारण अन्नरसों से, उनके द्वारा पिता-माता के शरीरो से एेक्य को प्राप्त होकर धीरे धीरे स्वर्ग मोक्ष, नरक, वध, बन्ध आदि के कारणभूत देहभाव को प्राप्त होती है