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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 47

छियालीसवाँ सर्ग समाप्त सैंतालीसवाँ सर्ग अतीत, भावी और वर्तमान करोड़ों ब्रह्मा और ब्रह्माण्डों का तथा नियत ओर अनियत क्रमवाले देवता आदि का वर्णन ।

71 verse-groups

  1. Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्‌, आप सब धर्मो के तत्त्वज्ञ ओर सब वेद, वेदांगों के पारदर…
  2. Verse 2उपदेश दे रहे आपके उत्तम, विपुल अर्थवाले, वर्ण पद, वाक्य और प्रकरणों द्वारा स्फुट, विचित्र…
  3. Verses 3–4इस प्रकार प्रशंसा द्वारा गुरुजी को प्रोत्साहित कर प्रसंगप्राप्त ब्रह्मा आदि देवताओं के ऐश…
  4. Verse 5श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, अनेक लाख ब्रह्मा, अनेकों सौ शंकर ओर इन्द्र एवं…
  5. Verse 6इसी प्रकार अन्यान्य कालों मेँ उत्पन्न हुए अनन्त जगतां में अन्य बहुत से सुर, असुर आदि के श…
  6. Verse 7हे महाबाहो, ब्रह्मा आदि उन देवताओं की ब्रह्माण्ड में उत्पत्तिर्यो इन्द्रजाल में उदित हुई-…
  7. Verse 8कभी शंकरपूर्वक सृष्टियाँ होती है, कभी प्रथम उत्पन्न हुए ब्रह्मा से सृष्टियाँ होती है, कभी…
  8. Verse 9ब्रह्मा आदि के आविर्भाव स्थान भी अनियत है, ऐसा कहते हैं। कभी (पादकल्प में) ब्रह्मा कमल से…
  9. Verse 10इसी प्रकार सूर्य आदि पदाधिकारियों में भी अनियम है, ऐसा कहते हैं। किसी ब्रह्माण्ड में शंकर…
  10. Verse 11किसी सृष्टि में पृथ्वी निबिड़ पेड़ों से व्याप्त हुई, किसी सृष्टि में मनुष्यों से निबिड़ ह…
  11. Verse 12कोई भूमि मृणमयी हुई, तो कोई पत्थरों से पूर्ण थी । कोई स्वर्णमयी थी, तो कोई ताम्रमयी थी
  12. Verse 13इस ब्रह्माण्ड में ही कितने आश्चर्यमय जगत हैं और अन्यान्य ब्रह्माण्डमें भी अन्य प्रकारों स…
  13. Verse 14इस ब्रह्मतत्त्व महाकाश में अनन्त जगत सागर की तरंगों के समान उत्पन्न होते हैं और लीन होते…
  14. Verse 15जैसे सागर में तरंग उत्पन्न होती है, जैसे मरुभूमि में मृगजल उत्पन्न होता हैं, जैसे आम में…
  15. Verse 16भले ही सूर्य की किरणों में चंचल त्रसरेणु गिने जा सकते हैं, पर ब्रह्म में चंचल ब्रह्माण्डो…
  16. Verse 17जैसे वर्षा आदि ऋतुओं मे बहुत से मच्छर आदि के समूह उत्पन्न हो-हो कर नष्ट हो जाते हैं, वैसे…
  17. Verse 18उन सृष्टियों के प्रवाह की अनादिता को कहते हैं। किस समय से लेकर ये नित्य उत्पन्न ओर विनष्ट…
  18. Verse 19अनादि काल से सृष्टि परम्पराएँ तरंगों के समान निरन्तर स्फुरित होती हैं, पूर्व से पहले ये थ…
  19. Verses 20–22देवता, असुर और मनुष्यों से युक्त ये सब भूत जातियाँ नदी की तरंगों की रीति से ही उत्पन्न हो…
  20. Verse 23ब्रह्मपुर से उपलक्षित हृदयाकाश की शोभारूप ब्रह्मनिर्मित अन्य ब्रह्माण्ड परम्पराएँ जैसे ध्…
  21. Verses 24–25अन्य सृष्टि परम्पराएँ, जो कि आगे होगी, जैसे मिट्ठी की राशि में घड़े स्थित है, जैसे अंकुर…
  22. Verse 26मूर्खो से अध्यस्त और विस्तार को प्राप्त की जा रही आकाश लताओं की तरह आविर्भूत ओर तिरोभूत ह…
  23. Verse 27सभी अपने अन्तर्गत सृष्टि समष्टिरूप ब्रह्माण्डों की सृष्टियाँ तरंग के समान नश्वरतारूप धर्म…
  24. Verses 28–30हे श्रीरामचन्द्रजी, सब ब्रह्माण्डं की विचित्र आकार-प्रकार के विकारों से युक्त विचित्र रूप…
  25. Verse 31परमार्थ दृष्टि से तो अज्ञ व तत्त्ववेत्ता सबकी दृष्टि से सब सृष्टियाँ जैसे जड़ों द्वारा खी…
  26. Verses 32–33कभी पद्म से उत्पन्न हुए ब्रह्मा होते हैं ऐसा जो कहा उसमें यथा योग्य पंचीकरण के अनन्तर होन…
  27. Verse 34कभी वायु पहले स्थूलता से स्थिति को प्राप्त होता है, उससे ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, इसलिए…
  28. Verse 35कभी जल पहले स्थूलतारूप से स्थिति को प्राप्त होता है, उससे ब्रह्मा उत्पन्न होते है, इसलिए…
  29. Verse 36कभी पृथ्वी पहले स्थूलता को प्राप्त होती है, उससे ब्रह्मा उत्पन्न होते है, इसलिए वे पार्थि…
  30. Verse 37अव उक्त आकाश आदि के एक-एक करके प्रथम आविर्भाव में युक्ति कहते है । इन चारों भूतो को अपने…
  31. Verse 38सभी पंचभूतों के कार्य हैं, इसलिए सव में पंवात्मकता होने पर उनसे उत्पन्न हुए प्रजापति में…
  32. Verse 39उसके देहाक्यवो से सृष्टि की प्रवृत्ति दिखाते हैं । इसके अनन्तर कभी उसके मुँह से, कभी चरण…
  33. Verse 40कभी नारायण नामक पुरुष की नाभि में कमल उत्पन्न होता है, उसमें ब्रह्मा वृद्धि को प्राप्त हो…
  34. Verse 41सद्रूप से विद्यमान उसकी सत्‌ से ही उत्पत्ति कैसे हो सकती है, यों पूछ रहे श्रीरामचन्द्रजी…
  35. Verse 42यदि सत्‌ पुरुष का अपने नाभिकमल में जन्म नहीं हो सकता है, तो इस असंग अद्वितीय ब्रह्म में आ…
  36. Verse 43पद्मज की उत्पत्ति के समान व्योमज की उत्पत्ति भी मन की अचिन्त्य रवनाशक्ति का अवलम्बन करके…
  37. Verses 44–45कभी परम पुरुष जलमें बीज की सृष्टि करता हे । उससे पद्म (भूकमल) अथवा विशाल ब्रह्माण्ड उत्पन…
  38. Verse 46हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार प्रत्यगात्मा में अविद्यमान इन विचित्र सृष्टियों मे ब्रह्मा…
  39. Verse 47एक का यह वर्णन स्थालीपुलाक न्याय से अन्यान्य सृष्टियों के भी दृष्टान्त के लिए है, ऐसा कहत…
  40. Verses 48–49यह संसार मन का विलासमात्र है, यह सिद्धान्त हे । आपके सम्यग्‌ ज्ञान के लिए मैंने यह सृष्टि…
  41. Verses 50–51पूर्वरर्णित सात्विक, राजस आदि जीव जाति भेद भी दृष्टान्तार्थ ही कहे है । ऐसा कहते है । सात…
  42. Verse 52यदि कोई कहे अल्पकालस्थायी दीपक दो परार्धे तक रहनेवाले ब्रह्मा आदि के शरीरों के उपमान कैसे…
  43. Verse 53फिर कृत युग, फिर त्रेता, फिर द्वापर, फिर कलि इस प्रकार सारा जगत चक्र के भ्रमण की तरह पुनः…
  44. Verse 54फिर मन्वन्तरों के आरम्भ होते हैं, इस पर एक कल्प के बाद अनेकानेक कल्पों की परम्पराएँ फिर-फ…
  45. Verse 55दिन-रात ओर कलाओं से (तीस काष्ठारूप यानी मुहूर्त के द्वादशभागरूप क्षण का तीसवाँ हिस्सारूप…
  46. Verse 56जैसे पत्थर आदि के आघात से रहित, तपाये हुए लोह-पिण्ड में आग की चिनगारियाँ स्थित रहती हैं व…
  47. Verse 57जैसे वृक्ष में विभिन्न ऋतुओं में होनेवाले फल-फूल आदि कभी अनभिव्यक्त रहते हैं, कभी प्रकट ह…
  48. Verse 58सर्वात्मा चिद्विवर्त ही सदा इस प्रकार की आकृतिवाला होता है, क्योंकि जैसे लोचनो से द्विचन्…
  49. Verse 59जैसे चन्द्रमा से ही ये सब किरणे आती हैं, उसमें स्थित होती हुई भी उसमें अस्थित-सी प्रतीत ह…
  50. Verse 60हे श्रीरामचन्द्रजी, यह संसार कभी भी सत्‌ नहीं है, क्योकि सर्वशक्ति चैतन्य में असंसार स्वभ…
  51. Verse 61हे सज्जनशिरोमणे श्रीरामचन्द्रजी, यह जगत कभी भी असत्‌ नहीं है, क्योकि सर्वशक्ति चैतन्य में…
  52. Verse 62अधिष्ठान चैतन्य से दीप्त संसारिता ओर काल से उपलक्षित संसार महाकल्प तक रहता है, आगे नहीं र…
  53. Verse 63यदि कोई शंका करे कि संसार की सत्ता ओर असत्ता परस्पर विरुद्ध है 2 तो इस पर दृष्टिभेद होने…
  54. Verse 64अज्ञानी की दृष्टि से निरन्तर अविच्छिन्न संसार के रहने के कारण मिथ्या भी यह संसारमाया नित्…
  55. Verse 65इसीलिए मीमांसक का जगत कभी भी असत्‌ नहीं है, इस प्रकार जगत प्रवाह नित्य है, यह व्यवहार भी…
  56. Verse 66अज्ञानियो की दृष्टियों के विचित्र होने के कारण बुद्ध आदि द्वारा अपनी-अपनी प्रक्रिया के नि…
  57. Verse 67इसी प्रकार चन्द्रमा और सूर्य के तेज प्रकाश से युक्त दिशाओं में पर्वत, भूमि, समुद्र आदि की…
  58. Verse 68ऐसा कोई संकल्पकल्पनाओं का समूह नहीं है, जो सर्वव्यापक, अद्वितीय, नामरूपरहित, परमतत्त्व मे…
  59. Verses 69–70प्रसंगतः प्राप्त सब पदार्थों की उत्पत्ति की उपपत्ति कर प्रस्तुत सृष्टि के बार-बार होने का…
  60. Verses 71–72फिर दैत्य होते हैं, इधर देवता होते हैं, पुन: अन्यान्य लोकों का प्रसार होता है, पुनः स्वर्…
  61. Verse 73सुमेरुरूप कर्णिका से मनोहर, सहयाद्रिरूपी केसर से सुशोभित, प्राणियों के पुण्यरूपी सुगन्‍्ध…
  62. Verses 74–75सूर्यरूपी सिंह व्योमरूपी वन में आक्रमण कर किरणरूपी नखों से अन्धकाररूपी गजघटाओं को छिन्न-भ…
  63. Verse 76चन्द्र भी चंचल और सफेद मंजरियों के समान सुन्दर अपनी किरणों से दिशारूपी वधू के मुख को अलंक…
  64. Verse 77सृष्टिकालरूपी कपिंजल (पक्षी) क्रियारूपी पंखों से संसार निर्माणनामक कुछ घटपटरूप कार्य करके…
  65. Verse 78पूर्व इन्द्ररूप भ्रमर के अपने अधिकार से निवृत्त होने पर नवीन, तत्‌ तत्‌ मन्वन्तर के अधिका…
  66. Verses 79–81जैसे प्रलयकाल का वायु अपने भीतर सो रहे भगवान विष्णु के साथ समुद्र को कलुषित कर देता है वै…
  67. Verses 82–83बनाए गए हैं, ऐसा कल्पनामक चक्र निरन्तर वेग से घुमाया जाता है ॥८ ०॥ शुभस्थिति से रहित जगत,…
  68. Verse 84कुलाचल के समान विपुल आकारवाले पुष्करावर्त नामक प्रलयकाल के मेघो की वृष्टियों से जगत फिर फ…
  69. Verses 85–86समरस हृदयवाले आदि देव कितने ही वर्षो तक जीर्ण शरीर से जीवन का अनुभव कर फिर अपनी आत्मा में…
  70. Verses 87–89फिर प्रलय होने के बाद सृष्टि समारम्भरूप सबकी उत्पत्ति होती है, हे श्रीरामचन्द्रजी, चक्र क…
  71. Verse 90दीर्घभ्रमरूप इस महामाया के आडम्बरमें यह सत्य है, यह असत्य हे", इस प्रकार निश्चय करने के य…