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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

कस्मिंश्चिदण्डे त्र्यक्षोऽर्कः कस्मिंश्चिदपि वासवः । कस्मिंश्चित्पुण्डरीकाक्षः कस्मिंश्चित्त्र्यक्ष एव हि ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार सूर्य आदि पदाधिकारियों में भी अनियम है, ऐसा कहते हैं। किसी ब्रह्माण्ड में शंकरजी मुख्य पदाधिकारी हैं तो किसी में सूर्य मुख्य पदाधिकार है । किसी में इन्द्र मुख्य पदाधिकारी हैं तो किसी में नारायण मुख्य पदाधिकारी हैं एवं किसी में एकमात्र शिवजी ही देवताओं के अधिकार में स्थित हैं