Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verses 85–86
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verses 85–86 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 85,86
संस्कृत श्लोक
पुनः कतिपया भुक्त्वा समाः समरसाशयः ।
जीवितं जीर्णया तन्वा पुनः स्वात्मनि लीयते ॥ ८५ ॥
पुनरन्येन कालेन तथैव जगतां गणान् ।
मनस्तनोति वै शून्ये गन्धर्वनगरं यथा ॥ ८६ ॥
हिन्दी अर्थ
समरस हृदयवाले आदि देव कितने ही
वर्षो तक जीर्ण शरीर से जीवन का अनुभव कर फिर अपनी आत्मा में लीन हो जाते हैँ । फिर दूसरे समय
में मन शून्य में गन्धर्वनगर के समान उसी प्रकार जगतो का निर्माण करता है