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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 76

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verse 76 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 76

संस्कृत श्लोक

पुनः स्वर्गतरोः पुण्यक्षयवातसमीरिताः । पतन्तीह विनुन्नाङ्गाः पुण्यकृत्पुष्पराशयः ॥ ७६ ॥

हिन्दी अर्थ

चन्द्र भी चंचल और सफेद मंजरियों के समान सुन्दर अपनी किरणों से दिशारूपी वधू के मुख को अलंकृत करनेवाले और सब प्राणियों को सुख देनेवाले अमृतका पुन: संचय करता है॥ ७ ५॥ पुण्यनाशरूपी वायु से उड़ाए गये पुण्यात्मारूपी पुष्पसमूह क्षत-विक्षत शरीर होकर स्वर्गरूपी वृक्ष से फिर इस लोक में गिरते हैं