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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verses 87–89

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verses 87–89 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 87

संस्कृत श्लोक

पुरः सर्गसमारम्भः प्रलये सर्वसंभवः । सर्वं पुनरिदं राम चक्रवत्परिवर्तते ॥ ८७ ॥ किमेतस्मिन्महामायाडम्बरे दीर्घशम्बरे । राम सत्यमसत्यं वा निर्णेयं यदिहोच्यते ॥ ८८ ॥ दाशूराख्यायिकेवेयं राम संसारचक्रिका । कल्पनारचिताकारा वस्तुशून्या न वस्तुतः ॥ ८९ ॥

हिन्दी अर्थ

फिर प्रलय होने के बाद सृष्टि समारम्भरूप सबकी उत्पत्ति होती है, हे श्रीरामचन्द्रजी, चक्र के समान फिर यह सब घूमता है