Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verses 44–45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 44,45
संस्कृत श्लोक
कदाचिदेव पुरुषो वीर्यं सृजति वारिणि ।
तस्मात्प्रजायते पद्मं ब्रह्माण्डमथवा महत् ॥ ४४ ॥
तस्मात्प्रजायते ब्रह्मा कदाचिद्भास्करोऽप्यसौ ।
कदाचिद्वरुणो ब्रह्मा कदाचिद्वायुरण्डजः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
कभी परम पुरुष जलमें बीज की सृष्टि करता हे । उससे पद्म
(भूकमल) अथवा विशाल ब्रह्माण्ड उत्पन्न होता है, उससे ब्रह्मा उत्पन्न होते हैँ । कभी पहले कल्प में
सूर्य के अधिकार पर स्थित इस कल्प में ब्रह्मा होते हैं, कभी पूर्वकल्प मेँ वरूण के अधिकार पर स्थित
इस कल्प में ब्रह्मा होता हैँ ओर कभी पूर्वकल्प में वायु के अधिकार पर स्थित इस कल्प में ब्रह्मा होते
हैँ