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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 66

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verse 66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 66

संस्कृत श्लोक

अनारतपतद्रूपा दिशो दृष्टा विनश्वराः । विनाशीदं जगत्सर्वमिति किं नोपपद्यते ॥ ६६ ॥

हिन्दी अर्थ

अज्ञानियो की दृष्टियों के विचित्र होने के कारण बुद्ध आदि द्वारा अपनी-अपनी प्रक्रिया के निर्वाह के लिए कल्पित क्षणिक, परमाणु आदि व्यवहार भी उक्त दुष्ट से उपपन्न होते ही हैं, ऐसा कहते है । दिशाओं मेँ उदित हुए विनाशी बिजली आदि सदा क्षणभंगुर स्वभाववाले देखे गये हैं, क्योंकि वैसी ही सर्वत्र लोगों ने कल्पना की है, उसी के अनुसार यह सम्पूर्ण जगत विनाशी है, यह बात क्या उपपन्न नहीं हो सकती !