Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verses 71–72
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verses 71–72 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 71,72
संस्कृत श्लोक
पुनर्दैत्याः पुनर्देवाः पुनर्लोकान्तरक्रमाः ।
पुनः स्वर्गापवर्गेहाः पुनरिन्द्रः पुनः शशी ॥ ७१ ॥
पुनर्नारायणो देवः पुनर्दनुसुतादयः ।
पुनराशाचलच्चारुचन्द्रार्कवरुणानिलाः ॥ ७२ ॥
हिन्दी अर्थ
फिर दैत्य होते हैं, इधर देवता होते हैं, पुन: अन्यान्य
लोकों का प्रसार होता है, पुनः स्वर्ग और अपवर्ग प्राप्त करने की चेष्टाएँ होती हैं, पुनः इन्द्र होते हैं, पुनः
चन्द्रमा होते हैं, नारायण देव का भी पुन: प्रादुर्भाव होता है अनेक दानव भी पुनः उत्पन्न होते हैं, दिशाएँ
फिर चंचल और सुन्दर चन्द्रमा, सूर्य, वरूण और वायु के प्रसार से युक्त होती है