Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
पुनःपुनश्च भावित्वान्न कदाचिदनीदृशम् ।
जगदित्येतदित्युक्तं न मृषा रघुनन्दन ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए मीमांसक का जगत कभी भी असत् नहीं है, इस प्रकार जगत प्रवाह नित्य है, यह व्यवहार
भी उपपन्न होता है, ऐसा कहते हैँ ।
हे रघुनन्दन श्रीरामचन्द्रजी, बार-बार होने के कारण यह जगत कभी भी असत् नहीं है, ऐसा जो
मीमांसकों ने कहा है, वह भी पूर्वोक्त दृष्टि से असत्य नहीं है, क्योकि वह “उनके अभीष्ट कर्मकाण्डके
प्रमाण्य का उपपादक है