Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
लोकालोककलाकालकलनाकलितान्तरम् ।
पुनःपुनरिदं सर्वं न किंचन पुनःपुनः ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
दिन-रात ओर कलाओं से (तीस काष्ठारूप यानी मुहूर्त के
द्वादशभागरूप क्षण का तीसवाँ हिस्सारूप कलाओं से), जो कि प्राणियों के आयुकाल की कल्पनारूप
है, परिच्छिन्न सब पदार्थों से युक्त यह सब जगत पुनः-पुनः होता है और पुन:-पुनःकुछ भी नहीं रहता
है