Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verses 50–51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verses 50–51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 50,51
संस्कृत श्लोक
पुनः सृष्टिः पुनर्नाशः पुनर्दुःखं पुनः सुखम् ।
पुनरज्ञः पुनस्तज्ज्ञो बन्धमोक्षदृशः पुनः ॥ ५० ॥
पुनः सृष्टिकराऽवीतवीतस्नेहदृशः पुनः ।
दीपा इव कृतालोकाः प्रशाम्यन्त्युद्भवन्ति च ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वरर्णित सात्विक, राजस आदि जीव जाति भेद भी दृष्टान्तार्थ ही कहे है । ऐसा कहते है ।
सात्विकी आदि जीवजातिर्यो भी इस प्रकार उत्पन्न हुई है, यह कहने के लिए ही यह सृष्टिक्रम
आपसे कहा गया हे ।४९॥
जव तक इस मन का समूलोन्मूलन नहीं किया जाता, तब तक संसार परम्परा का कभी विराम नहीं
होता, यह दथतिहै।
फिर सृष्टि , फिर नाश, फिर दुःख, फिर सुख, फिर अज्ञानी, फिर ज्ञानी, फिर बन्ध और मोक्ष की
अस्तित्व कल्पना होती है । फिर वर्तमान और आगामी प्रियजनों में तथा अतीत प्रियजनों में स्नेह
दृष्टियाँ, जो सृष्टि करनेवाली हैं, उजाला करनेवाले दीपों के समान पुनः पुनः शान्त होती है, पुनः-
पुनः उत्पन्न होती हैं