Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verses 82–83
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verses 82–83 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 82
संस्कृत श्लोक
पुनरर्कगणेष्वग्निदग्धानन्तकलेवरम् ।
सर्वभूतास्थिसंपूर्णं जगदेति श्मशानताम् ॥ ८२ ॥
पुनः कुलाचलाकारपुष्करावर्तवर्षणैः ।
नृत्यद्भवबृहत्फेनां यात्येकार्णवतां जगत् ॥ ८३ ॥
हिन्दी अर्थ
बनाए गए हैं, ऐसा कल्पनामक चक्र निरन्तर वेग से घुमाया जाता है ॥८ ०॥ शुभस्थिति से रहित जगत,
जिसमें जिस विषय में पूर्व अभ्यास हे उस विषय के अनुसार संकल्प है, सूखे हुएवन के समान फिरनीरसता
को (धर्मरसहीनता को) प्राप्त होता है ॥८ १॥ सूर्य समूहों के उदय होने पर सूर्यसमूहरूपी प्रदीप्त अग्नि
से जिसमें अनन्त शरीर जलाये गये हैं एवं सब प्राणियों की हड्डियों से परिपूर्ण जगत फिर श्मशान बन जाता
हे