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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verses 24–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verses 24–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 24,25

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मण्यन्या भविष्यन्त्यः स्थिताः सर्गपरम्पराः । घटा इव मृदो राशावङ्कुरे पल्लवा इव ॥ २४ ॥ यावद्ब्रह्म चिदाकाशे तथा त्रिभुवनश्रियः । स्फाराकारविकाराढ्याः प्रेक्ष्यमाणा न किंचन ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्य सृष्टि परम्पराएँ, जो कि आगे होगी, जैसे मिट्ठी की राशि में घड़े स्थित है, जैसे अंकुर में पल्लव रहते हैं, ४ यह अवान्तर सृष्टि के अभिप्राय से कहा गया है । वैसे ही ब्रह्म में स्थित है, जब तक तत्त्वज्ञान से देखी जा रही ये कुछ भी नहीं है, ऐसा बाध होता है, उससे पहले तक विपुल आकारवाले विकारों से युक्त ये त्रिभुवनशोभाएँ चिदाकाश में होंगी