Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 84
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verse 84 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 84
संस्कृत श्लोक
पुनः संशान्तवाय्वम्बुरिक्तं सकलवस्तुभिः ।
तदपूर्वमिवाकाशं जगदायाति शून्यताम् ॥ ८४ ॥
हिन्दी अर्थ
कुलाचल के समान विपुल आकारवाले पुष्करावर्त नामक प्रलयकाल के मेघो की वृष्टियों से
जगत फिर फिर एकमात्र सागरता को, जिसमें नाच रहे संहाररुद्र ही सफेद होने के नाते विशाल फेन के
ढेर-से प्रतीत होते हैं ॥८ ३॥ फिर जिसमें वायु ओर जल निश्चल हो गया है एवं सब वस्तुओं से रिक्त
जगत अपूर्वं आकाश के समान शून्यता को प्राप्त होता हे