Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
यथा तरङ्गा जलधौ मृगतृष्णा मरौ यथा ।
कुसुमानि यथा चूते तथा विश्वश्रियः परे ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सागर में तरंग
उत्पन्न होती है, जैसे मरुभूमि में मृगजल उत्पन्न होता हैं, जैसे आम में बौर उत्पन्न होते हैं, वैसे ही
परब्रह्म में विश्व की सम्पत्तियाँ उत्पन्न होती है