Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
उदाराणि विविक्तानि पेशलान्युदितानि च ।
श्रोतुं तृप्ति न गच्छामि वचांसि वदतस्तव ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
उपदेश दे रहे आपके
उत्तम, विपुल अर्थवाले, वर्ण पद, वाक्य और प्रकरणों द्वारा स्फुट, विचित्र कथा, युक्ति के प्रतिपादन में
निपुण, आत्मतत्त्व के प्रकाशक होने ओर हृदयकमल को प्रकाशित करने के कारण सूर्य आदि के समान
उदित हुए, मनोहर वचनो को सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती