Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
कदाचिदम्बरे शुद्धे मनस्तत्त्वानुरञ्जनात् ।
सौवर्णं ब्रह्मगर्भं च स्वयमण्डं प्रवर्तते ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
पद्मज की उत्पत्ति के समान व्योमज की उत्पत्ति भी मन की अचिन्त्य रवनाशक्ति का अवलम्बन
करके ही होती है, यों समर्थन करते हैँ ।
किसी समय शुद्ध आकाश में मन की शक्ति से सुवर्ण का ब्रह्माण्ड अपने आप उत्पन्न होता है,
जिसके गर्भ में ब्रह्मा रहते हैं