Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
कदाचिदप्सु वायौ वा सुस्फारे वापि तेजसि ।
स्वयं संपद्यतेऽकस्मात्पुमान्प्रकृतिभावितः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
सभी पंचभूतों के कार्य हैं, इसलिए सव में पंवात्मकता होने पर उनसे उत्पन्न हुए प्रजापति में एक
भूत से उत्पन्न हुए है” ऐसा व्यवहार कैसे ? ऐसी यदि कोई शंका करे, तो उक्त भूत का अधिक अंश होने
से उसमें एकभूतजत्व का व्यवपदेश होता है, ऐसा कहते हैं।
किसी समय जल के अथवा वायु के या तेज के अधिक भागवाले होने पर तदुपाधिक प्रजापति पूर्व
उपासना के अनुसारी स्वभाव से वासित होकर जलज, वायुज, तैजस इत्यादि आकार से अकस्मात
स्वयं संपन्न हो जाता हे