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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 94

तिरानबेवाँ सर्ग समाप्त चौरानवेवों सर्ग दोनों का-श्रीवसिष्ठजी तथा उस सिद्ध का-सिद्धलोक में गमन तथा पिशाचों एवं देवताओं की केवल मन के अनुसार स्थिति, यह वर्णन।

78 verse-groups

  1. Verses 1–2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, उसके बाद आकाश के समान विस्तीर्णं सात समुद्र और…
  2. Verse 3यदि प्रणिधान (ध्यान) द्वारा सब विषयों में मनोयोय हो सकता तो आपका पतन कदापि न होता और सकल्…
  3. Verse 4अब उठिये, हम दोनों सिद्ध लोको में पूर्ववत्‌ निवास करें-आप नन्दनवन में चलकर विहार कीजिये औ…
  4. Verse 5हे श्रीरामचन्द्रजी, ऐसा निर्णय कर तारों के सदुश वे दोनों सिद्ध गुलेल से उड़े हुए दो पत्थर…
  5. Verse 6परस्पर प्रणामपूर्वक एक दूसरे को विदा कर वह सिद्ध अपने अभीष्ट देश को चला गया और मैं भी अपन…
  6. Verse 7हे राघव, इस प्रकार पाषाणोपाख्यान एवं सिद्ध का सारा वृत्तान्त मैंने आपसे कह सुनाया । देखिय…
  7. Verse 8कृटी में स्थित जो आपका स्थूल शरीर था, उसे उम्र शिद्ध ने फक दिया, यह मेरा अनुमान हैं ऐसा आ…
  8. Verses 9–10कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, हाँ, मुझे स्मरण हो आया, सुनिये उसके बाद की मेरी आत्म कहानी । सु…
  9. Verse 11हे श्रीरामचन्द्रजी, इसमें सन्देह नहीं कि उस समय मैं गगनाकार हो गया था | न तो मेरा कोई आधा…
  10. Verse 12उस समय न तो मैं आपके सदृश स्थूल पदार्थो के अवबोध करनेवालों की तरह ग्रहीता (ग्रहणकर्ता) था…
  11. Verse 13मन का जो मनन है एकमात्र वही मेरा स्वरूप था, मैं पृथ्वी आदि से बिलकुल रहित था, मेरा आकार स…
  12. Verse 14अपने अनुभव की ओर उन्मुख हुआ मैं यानी स्वानुभवरूप मैं स्वयं भी पदार्थसमूहों से अवरुद्ध नही…
  13. Verse 15हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह के अर्थ की संभावना में स्वप्न के अनुभवपूर्ण दृष्टान्त हैँ । जो…
  14. Verse 16जिस प्रकार घर में सोये हुए स्वप्न मेँ विचरण करनेवाले स्वप्न में व्यवहार कर रहे पुरुष को उ…
  15. Verse 17पार्थिव आकार के तुल्य भासुर यानी देदीप्यमान अन्य प्राणियों को मैं तो देखता था, लेकिन स्थू…
  16. Verse 18गुने वहाँ कोड नहीं देखता था, यह आपका कहना आपके ही पूर्व के कथन से विरुद्ध है। क्योकि अभी…
  17. Verse 19सत्य ग्रंकल्पानुसारी दर्शन की व्यवस्था से श्रीवश्तिष्ठजी दोनों का परिहार करते हैं । श्रीव…
  18. Verse 20ज्ञानप्रिद्ध महानुभावो का सदा ही सूक्ष्म शरीर रहता है, उनका तो स्थूल शरीर होता ही नहीं: य…
  19. Verse 21यह जो सिद्ध था, वह %ी सत्यसकल्य तथा प्रिद्ध था. अतः मुझे देख सकता था, इस आशय से उसमे विशे…
  20. Verse 22साधारण लोगों की अपेक्षा सिद्ध पुरुष में विशेषता बतलाते हैं / चिरकाल की वासना से जिस पुरुष…
  21. Verse 23जहाँ दो प्रिद्ध परस्परविरुद्ध स्रकल्प करें- जैसे एक तो यह संकल्य करे कि में” इसे देखूँ और…
  22. Verses 24–25ऐसा ही सही, परन्तु आपके इस कथन से ग्रकृत में क्या आया, इसपर कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी…
  23. Verse 26हे अनघ, मे वहाँ सुरलोको में अत्यन्त जोर से शब्द कर रहा था, फिर भी वहाँ जैसे स्वप्न के पुर…
  24. Verse 27वहाँ पर जब कोई गिरता तथा नीचे से ऊपर की ओर चढता तो वैसे मौकों में में झट अपने हाथ आदि का…
  25. Verse 28हे रघुनन्दन, इस तरह मैं आकाशका पिशाच हो गया ओर देवताओं के घरों मे इस एक अनिर्वचनीय पिशाचत…
  26. Verse 29श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, कृपाकर यह बतलाइये कि इस लोक में पिशाच किस आकार के होते ह…
  27. Verse 30श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस लोक में पिशाच जिस तरह के हैं, उनका मैं आपसे…
  28. Verse 31हे श्रीरामचन्द्रजी, कोई पिशाच आकाश के सदुश सूक्ष्म शरीरवाले-मनोमय देहवाले स्वप्न के समान…
  29. Verse 32पिशाच मनोमात्रमय शरीरवाले हैं तो के दूसरों के ऊपर आक्रमण केसे करते हैं; क्योकि मन में बाह…
  30. Verse 33उसका यदि मरण के अनुकूल कर्माशय होता है तो मर्मस्थानों में पहुँचकर इनमें कोई पिशाच शीघ्र प…
  31. Verse 34इनमें कोई आकाश के सदृश, कोई नीहार (कुहरा) के तुल्य और कोई स्वप्न काल के मनुष्यों के आकार…
  32. Verse 35कोई मेघखण्ड के समान, कोई वायुमय देहवाले और कोई प्राणी की भ्रान्ति के अनुसार देहधारी होते…
  33. Verse 36इन पिशाचों को पकड़ना सम्भव नहीं है और ये भी यदि किसी को पकड़ना चाहें, तो पकड़ नहीं सकते ह…
  34. Verse 37तथा वे सब शीत ओर तापसे उत्पन्न हुए सुख और दुःख का भी अनुभव करते हैं । किन्तु वे बाहर के ज…
  35. Verse 38वे सब इच्छा, द्वेष, भय, क्रोध, लोभ और मोह से युक्त रहते हैं और मन्त्र,ओषध, तप, दान, धैर्य…
  36. Verse 39तब किस उपाय से उन्हे मनुष्य देख पाते है; यह कहते हैं / सत्त्व का अवष्टम्भरूप योगधारणाका ज…
  37. Verse 40देवयोनियों के ग्यारह भेदों के भीतर यह श्रुतयोनि है, इसलिये अणिमा आदि ऐश्वर्यों के तारतम्य…
  38. Verse 41इनमें कुछ ऐसे होते हैं जिनकी उपमा कुत्तों तथा सियारों से दी जा सकती है । कोई ऐसे होते हैं…
  39. Verse 42हे श्रीरामचन्द्रजी, इनके यही सब रहने के स्थान हैं, इसी तरह के आकार के तथा ऐसे ही आचार के…
  40. Verses 43–44हे श्रीरामचन्द्रजी, कार्यब्रह्म से विलक्षण जो मायाशबल ब्रह्म है, वह समस्त शक्तियों के स्व…
  41. Verse 45वह मनरूप जो जीव है वही समष्टिरूप से संकल्पाकाशरूपधारी ब्रह्मा कहलाता है । असद्रूप इस जगत्…
  42. Verse 46इस प्रकार मन ही ब्रह्मा बनकर स्थित है । वह ब्रह्मा सदेह होने पर भी निर्मल आकाशरूप ही है।…
  43. Verse 47पृथ्वी आदि पंचभूतों की मूर्ति से रहित होने पर वह ब्रह्मा सूक्ष्म शरीर से सम्पन्न है । हे…
  44. Verse 48आपका मन जैसे आकाश में कल्पित नगर का अवलोकन करता है, वैसे ही अपने में कल्पित विरंचि (ब्रह्…
  45. Verse 49एकमात्र यह कारण है कि वह ब्रह्मा अपने जिस जिस संकल्प को जानता है तत्‌-तत्‌ पदार्थो के आका…
  46. Verse 50निराकार मनरूप वह ब्रह्मा ब्रह्मस्वरूप चिदाकाश में एकमात्र जिस शून्यस्वरूप ब्रह्माण्डाकार…
  47. Verse 51तथा इसका प्रतिभास ही इस समय चिरकाल की एकमात्र भावना से घनीभूत पुष्ट होकर सुदीर्घ स्वप्न क…
  48. Verses 52–53सूक्ष्मशरीरधारी उस ब्रह्म का यह सगनुभव ब्रह्मस्वरूप होने पर भी चिरकाल की भावना से अधिक प्…
  49. Verses 54–55वह ब्रह्मा ब्रह्ममात्रात्मा ब्रह्मस्वरूप ही हैं । ब्रह्मात्मरूप जीव ओर जगत्‌, ये दोनों अन…
  50. Verse 56हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे आप अपने संकल्पपुरुष में तथा असत्‌ होते भी सद्रूप नगर आदि में पृथ…
  51. Verse 57भूतमयता देखने के वाद ब्रह्माण्डात्मक अपने शरीर के धातुओं के चितिसत्ता से पुष्ट कठिन एवं द…
  52. Verse 58जैसे आपने अपने असत्य संकल्प को सत्यरूप ही अनुभव किया
  53. Verse 59जैसे वह ब्रह्मा स्वयं चिन्मयाकाश ही हैं वैसे ही परमार्थतः उनका संकल्प भी चिदाकाशरूप ही है…
  54. Verse 60तब उनके द्वारा निर्मित हुए चन्द्र, सूर्या तारे आदि सर्वविध अर्थक्रिया में हेतु कैसे हैं ?…
  55. Verse 61ऐसी स्थिति में यह समस्त जगत्‌ सत्य उस ब्रह्मदेव का एकमात्र मनोराज्य ही कहा जाता है और यह…
  56. Verse 62जिस प्रकार स्वप्न का नगर चिदाकाशरूप है जैसे संकल्प का पर्वत चिदाकाश स्वरूप है वैसे ही ब्र…
  57. Verse 63इस तरह एकमात्र आभासस्वरूप से सर्वदा स्फुरित हो रहे इस जगत्‌ की जन्म, स्थिति और प्रलय की प…
  58. Verse 64एकमात्र यही कारण है कि आत्मा की विदाकाशरूपता का अनुसन्धान करने पर आपके, मेरे या अन्य किसी…
  59. Verse 65किये यह निरर्थक संसार क्यों अनर्थ के लिए उदित हुआ है ? बिना किसी मतलब के यानी बिलकुल अर्थ…
  60. Verse 66हे श्रीरामचन्द्रजी, वस्तुतः न तो सृष्टि का कोई कारण है, न सर्गता है ओर न असर्गता ही है, क…
  61. Verses 67–68सर्वदा शून्य, विपुल आभोगवाले, स्वच्छ चितिरूपी जल से परिपूर्ण, चिदाकाशरूपी अविनाशी क्षेत्र…
  62. Verse 69कल्पनारुपी फक के अभाव में बतलाते हैं / वस्तुतः यहाँ पर न तो कोई खेत है, न कुछ उसमें बोया…
  63. Verse 70इस प्रकार पिशाच जाति के वर्णन के प्रस से खृष्टि के तत्व का वर्णन करके अब प्रस्तुत विषय के…
  64. Verse 71इनमें जो शिलाएँ अर्ध उज्ज्वल है वे नर, नाग आदि की जातियाँ हैं तथा जो मलिन और रजोगुण से दू…
  65. Verse 72इनमें जो बड़ी, बड़ी वजनदार, कान्ति, प्रकाश आदि फलों से हीन, शून्याकार, क्षयक्षत, देहाकार…
  66. Verse 73उस खेत में उत्तम देवादिरूप रत्न ही पैदा होवें, यही संकल्प हिरण्यगर्भ को क्यो नहीं हुआ, वृ…
  67. Verse 74शिलारूपता की उत्प्रेक्षा करने के बाद अब भ्रूतजातियों में प्रसक्त भौतिकता का कारण करते हैं…
  68. Verse 75तब हम लोगो की देह मे भोकिकता का अनुभव केसे होता है ? इस शंका पर कहते हैं / चिरकाल के अभ्य…
  69. Verse 76ये पिशाच आदि भी चिरकाल के अभ्यास से आधिभौतिक रूपता को प्राप्त होकर अपने संसार में विहार क…
  70. Verse 77स्वप्नलोक में निवास करनेवालों के सदृश कोई कोई पिशाचों की ये जातियाँ भी परस्पर एक दूसरे को…
  71. Verse 78इनकी अनेक संस्थानों में अवस्थित कुछ ऐसी भी जातियाँ हैं, जो बहुधा मनुष्य के स्वप्न में निर…
  72. Verse 79पिशाचजातियों की तरह कृम्भाण्डादि जातियें की भी प्राय: सृक्ष्मदेहता होती है तथा इनमें भी व…
  73. Verse 80जैसे ऊँच-नीच जमीन के तारतम्य में जलकी (स्थिति में तारतम्य रहता है वैसे ही पाप के तारतम्य…
  74. Verse 81यदि मध्याह्नकाल में धूप से युक्त आँगन में भी पिशाच विद्यमान रहे, तो वहीं पर भी घोर अन्धका…
  75. Verse 82उस अन्धकार को सूर्य नहीं नष्ट करते और उसको दूसरा कोई देखता भी नहीं है । एकमात्र वह पिशाच…
  76. Verse 83जैसे हम लोगों के प्रकाश के लिए अग्नि तथा सूर्य आदि का तैजसमण्डल विद्यमान है वैसे ही पिशाच…
  77. Verse 84उल्लू के समान पिशाच आदि अपने स्वभाव से ही प्रकाश में निर्बल हो जाते हैं और अन्धकार में ओज…
  78. Verse 85हे श्रीरामचन्द्रजी, पिशाचयोनि में उत्पन्न जीव की जाति का मैंने आपसे वर्णन कर दिया, जैसा क…