Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 70
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, verse 70 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
याः शिलावलयस्तत्र पुष्टास्ता विबुधादयः ।
यास्तु वर्णोज्ज्वला एताः स्वास्थिता बुद्धबुद्धयः ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार पिशाच जाति के वर्णन के प्रस से खृष्टि के तत्व का वर्णन करके अब प्रस्तुत
विषय के अनुकूल होने से पूर्ववर्णित पंचभूताशिला के अवयव आदि रुपये भिन्न-भिन्न जातियाँ
दिखलाते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, उस कल्पनारूपी पंक से व्याप्त उस चिदाकाशरूपी खेत में जो ब्रह्माण्डरूपी
शिलाओं की अनेक पंक्तियाँ परिपुष्ट हुई हैं, वे सब देव आदि जातियाँ हे । (यह सामान्य रुपये
कहा गया है, अब विशेषरुप से उनका विभाग करके कहते हैं) इनमें जो अत्यधिक सौन्दर्य से
उज्ज्वल रत्नरूप हैं, वे तो देव, ऋषि आदि की जातियाँ हैं