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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

व्यवहारेषु मग्नेन लौकिकेष्वमलात्मना । क्षणाद्विस्मर्यते पुंसा आतिवाहिकमात्मनः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञानप्रिद्ध महानुभावो का सदा ही सूक्ष्म शरीर रहता है, उनका तो स्थूल शरीर होता ही नहीं: यह आपने अनेक बार मुझसे कहा है, ऐसी दशा में उनका स्थूलदेहबुद्धि से दूरे को देखना, उससे बातचीत करना आदि सत्य संकल्य केसे हो सकता हैं ? ऐसी आशंका करने पर श्रीरामजी कहते हैं / निर्मलात्मा सूक्ष्म शरीरधारी सिद्ध पुरुष भी लौकिक व्यवहारों में मग्न होकर क्षण भर में ही अपना सूक्ष्म शरीर भूल जाता है, तात्पर्य यह है कि जैसे समाधि और विवेक काल में सत्यसंकल्पन होता है वैसे ही व्युत्थान-व्यवहार-काल में सूक्ष्म शरीरभाव का विस्मरण भी होता है, इसलिए उनका परदर्शन, संवाद, आदिका संकल्प सम्भव है