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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

छायया भयदायिन्या त्वन्यत्र भ्रमरूपया । ते चित्ताक्रमणं कृत्वा बोधयन्ति नराशयम् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

पिशाच मनोमात्रमय शरीरवाले हैं तो के दूसरों के ऊपर आक्रमण केसे करते हैं; क्योकि मन में बाहर आक्रमण करने की सामर्थ्य नहीं है, इस शंकापर कहते हैं / अन्य मनुष्य के चित्त में प्रविष्ट होकर भ्रमरूप भयदायिनी अपनी छाया से आक्रमण करके वे सब पिशाच नानाविध दुःख आदि प्रदान करनेवाली चेष्टाओं से मनुष्य के आशय को उद्बोधित करते हैं