Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verses 54–55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, verses 54–55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 54,55
संस्कृत श्लोक
स ब्रह्मा ब्रह्ममात्रात्मा ब्रह्ममात्रात्मनोस्तयोः ।
अजातयोरेव सदा तदात्मजगतोर्द्वयोः ॥ ५४ ॥
अभिन्नयोरेव भृशं शून्यत्वाम्बरयोरिव ।
ऐकात्म्येनैव वसतोः पवनस्पन्दयोरिव ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
वह ब्रह्मा ब्रह्ममात्रात्मा ब्रह्मस्वरूप ही हैं । ब्रह्मात्मरूप जीव ओर जगत्, ये दोनों अनुभव हैँ तथा ये
दोनों ऐसे अभिन्न है जैसे कि आकाश और शून्यत्व और ये दोनों ऐसे एक रूप से स्थित हो रहे हैं
जैसे कि पवन ओर स्पन्दन