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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 94, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

कस्मान्मया तवोदन्तं विचार्यासौ स्थिरीकृता । न कुटी व्योम्नि तेन त्वमभविष्यः स्थिरस्थितिः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि प्रणिधान (ध्यान) द्वारा सब विषयों में मनोयोय हो सकता तो आपका पतन कदापि न होता और सकल्यकृटी स्थिर बनायी गई होती, यह कहते हैं / मित्र, मैंने आपका वृत्तान्त विचारकर वह कुटी आकाश में चिरस्थायिनी क्‍यों न बना दी | यदि मैं ऐसा कर देता तो अवश्य ही आपकी स्थिति स्थिर हो गई होती, आपका पतन न हो पाता। मित्र, हम दोनों से ही परस्पर अपराध हुआ, अतः परस्पर दोनों को क्षमा कर देनी चाहिए